हाँ मैं,
दिये सा जलना चाहता हूँ ,
बर्फ सा पिघलना चाहता हूँ ,
रात दिन घुटघुट कर भी
तेरे लिये जीना चाहता हूँ ,
रोने और हंसने की बात नहीं
अपने पराये की पहचान नहीं
फिर भी मैं तेरे, सिर्फ तेरे लिये
लिख-लिखकर गाना चाहता हूँ ,
खुद को खुद ही से मिलाना है ,
और तुझे भी अपना बनाना है ,
देख ले मुझे सारी दुनिया अब,
अंधेरों में चमकना चाहता हूँ ,
गुनहगार मैं नहीं तो कौन है ?
तू हमराज नहीं तो कौन है ?
तेरे मेरे गुनाहों की सब सजा
अब मैं ही पाना चाहता हूँ ,
रात सा ढला हूँ मैं ,
सूरज सा चला हूँ मैं ,
तेरे प्यार की खातिर
कितना जला हूँ मैं
तू कितना पास है मेरे?
फिर भी हाथ नहीं आता
दूर और दूर चला जाता
तुझे पाने के लिये अब
दिन सा ढलना चाहता हूँ।

बहुत सुंदर कविता
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